जाने वजह क्या थी पर जबसे माँ के हाथ की दही छूटी,
इम्तिहान महज़ पास ही किया है अव्वल नहीं आ पायी।

प्यार तो गहरा हो गया पर जबसे घर से निकली हूँ,
वजूद मेरा मेहमान सा हो गया।

एक मर्तबा पिताजी को कहते सुना था -
सोचा था अफसर बनाऊंगा बिटिया को मैं,
पता ना था दूर रह कर किमत चुकानी पड़ेगी।

महीना था पूरा दिवाली आने को चूल्हे पर कढ़ाई पकवान की चढ़ गयी,
पर्व क्या है आज? पूछने पर मुस्कुरा कर बोली - बेटी घर आ गयी।

चुपचाप मैं वापस चली आती हूँ, जानती हूँ दुख तेरा मुझसे बड़ा है
अंगने को तेरे सुना जो कर जाती हूँ।

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